महीपसिंह की कहानियों में प्रतीकात्मक भाषा

Dr.Leelakumari Amma.S                                             डॉ.लीला कुमारी अम्मा.एस

      भावों और विचारों को अधिक सक्षम बनाने के लिए साहित्यकार अपनी भाषा में मिथकों का भी प्रयोग करते हैं। मिथक के अन्तर्गत फैन्टसी, कल्पना, प्रतीक और बिम्ब आते हैं। प्रतीक का सामान्य अर्थ है – संकेत-चिन्ह, जिसका प्रयोग किसी अन्य के स्थान पर किया जाता है। दूसरे शब्दों में जब कोई पदार्थ किसी भाव या विचार का संकेत बन जाता है तो 'प्रतीक' कहलाता है। साहित्य में प्रतीक के प्रयोग का मुख्य उद्देश्य कथ्य को आकर्षक बनाना होता है। इनके दो पक्ष हैं – प्रस्तुत और अप्रस्तुत। प्रथम का संबंध विचार से है और दूसरे का संबन्ध अनुभूति से रहता है। महीप ने अपनी कहानियों की भाषा में प्रतीकों का प्रयोग किया है।

 समकालीन कहानीकारों में इनका महत्वपूर्ण स्थान है। भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने के लिए विविध प्रतीकों का प्रयोग हुआ है। इससे कहानियों की प्रभावात्मकता बढ़ती हुई दिखायी देती है। अर्थवत्ता को बढ़ा देते हैं। वे कहानी के परिवेश से सहज ही उद्भूत होते हैं।

 महीपसिंह की कई कहानियों के शीर्षक प्रतीकात्मक हैं। जैसे – 'कीचड' बचे रहने का प्रतीक है। 'नाला' रुकावट का प्रतीक है। 'ब्लाटिंग' पेपर सहनशीलता का प्रतीक है। 'कछुए' संकुचित वृत्ति का प्रतीक है।

 महीपजी की कहानियों में प्रयुक्त प्रतीकों के उदाहरण देखिए – "टूटी दोस्ती में सिर्फ बुरे पल याद आते हैं, इस सत्य को 'एक मित्र एक पत्र' कहानी में प्रतीकात्मक भाषा में इस तरह शब्दबद्ध किया है – मेरी अवस्था उस बाल्टी जैसी है जिसमं पानी भरा हुआ हो और नीचे कुछ कंकर-पत्थर भी पडे हों। यदि बाल्टी में एक छेद जाए तो उसका पानी जो धीरे-धीरे बह जाता है, किन्तु पत्थर शेष रहते हैं। मेरा मन भी वैसा ही हो गया है। उसके स्नेह का जल निकल चुका है और उसके रूखे और कटु व्यवहार के पत्थर शेष रह गए हैं"।1

 एक झूठ छिपाने के लिए दूसरा बड़ा छूठ बोलने पर व्यक्ति की मनःस्थिति को 'झूठ' कहानी के नायक 'अरूप' को लेकर कहा है -  "अरूप को लगा, उसने तीखे विष की बहुत-सी उल्टियाँ की हैं। उनकी नस-नस में, उसके चारों ओर विष ही विष भर गया है। विष के तीखेपन को दूर करने केलिए वह घंटों घूमता रहा। एक अड्डे पर जाकर आध पाव ठर्रा शराब भी पीकर आया। परन्तु विष था कि उसके अंग-अंग का उमैठे-ही जा रहा था"।2

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महीप ने स्थितियों, विचारों और जटिल बातों की अभिव्यक्ति करने के लिए प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग किया है।

  • सुबह की महक – महीपसिंह – पृ.सं.147
  • वही                    - पृ.सं.158

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