"दैवदशकम्" की प्रासंगिकता DAIVA-DASAKA-1

maheshडॉ. महेष.एस

सारांश :- केरलीय नवजागरण के अग्रदूत श्री नारायण गुरु द्वारा विरचित उत्कृष्ट वैश्विक प्रार्थना गीत "दैवदशकम" की प्रासंगिकता वर्तमान दौर में बढ़ती आ रही है।  इस प्रार्थनागीत में गुरु ने देव या ईश्वर शब्द का जो प्रयोग किया है वह परमसत्य रूपी परब्रह्म केलिए ही है।  विश्वमानवता का सन्देश ही यह प्रदान करता है।  मूल मलयालम भाषा में रचित इस प्रार्थनागीत का हिन्दी अनुवाद इस उत्कृष्ट काव्यकृति को विशाल हिन्दी क्षेत्र को परिचित कराना तथा इसके संदेश को विस्तृत जन समूह तक पहुँचाना  है।

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 केरलीय  नवजागरण के पुरोधा परिव्राजक महाप्रभु श्रीनारायण गुरु के द्वारा विरचित प्रसिद्ध प्रार्थनागीत है "दैवदशकम्"। मूल मलयालम भाषा में रचित इस प्रार्थनागीत की शताब्दी सन् 2014 में मनायी गयी। सौ-साल बीत जाने पर भी उत्तरोत्तर इस कालजयी प्रार्थनागीत की प्रासंगिकता बढ़ती जा रही है।  संसार भर जितने भी प्रार्थनागीत प्रचलित हैं वे सब किसी न किसी समाज एवं धर्म विशेष का प्रतिनिधित्व अवश्य करते हैं। लेकिन श्रीनारायण गुरुदेव ने "दैवदशकम्" की रचना किसी धर्म या जाति विशेष के लोगों केलिए नहीं की है। वास्तव में इसका स्वरूप एक विश्वप्रार्थना का है।  इस प्रार्थना में नारायण गुरु ने "ईश्वर" शब्द जो प्रयुक्त किया है वह ब्रह्मा, विष्णु, कृष्ण या ईसा मसीहा केलिए नहीं है बल्कि परमसत्य रूपी परब्रह्म केलिए है। अद्वैत दर्शन के आधार पर रची गयी इस कृति की पूर्ति दस श्लोकों में हुई है। इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद तथा भावार्थ नीचे प्रस्तुत है।

 

हे देव! संभालें हमें यहाँ,

हाथ न छोड दें कभी।

नाविक तू, भवसागर तरण

महा-नाव तेरा पद।

 हे ईश्वर! यहाँ हमेशा हमारी रक्षा कीजिए, कभी हमारा हाथ न छोड दीजिए अर्थात् कभी भी आपसे अलग न करें। आप का नामरूपी विराट नाव के ज़रिए मुझे इस भवसागर पार करने दीजिए। सच में आप इस नाव के कर्णधार हैं। जल्दी ही आप हमें आवागमन दुःख से बाहर लाइए।

 

 एक-एक कर गिन-गिन के

 मिटे अंतिम दृश्य तो

 स्तब्ध हो दृक् सा चित् 

 मिले तुझ में, निस्पन्द।

 इस संसार की हरेक वस्तु की हम जॉच करें तो यह सत्य समझ सकते हैं कि जो कुछ इन्द्रिय गृहीत है, वे सारे दृश्य केवल बिंब (प्रतीक मात्र) थे।  दृष्टि तो वहाँ अपने स्वरूप में सुस्थिर थी।  इतना ही नहीं जिस चित्त से हम ने ईश्वर की खोज की वही उसका वास्तविक वासस्थान है, यह पहचानने का विवेक ईश्वर हमें प्रदान करें। ये पंक्तियाँ अद्वैत दर्शन का सच्चा दृष्टान्त है।

 

अन्न, वसन सर्वस्व बिना

रोकटोक दिलाता,

धन्य-बनाता, रक्षक!

तू एक ही है, हमारे नाथ।

 अन्न-वस्त्र आदि सब कुछ देकर हमें निरन्तर प्रसन्न रखनेवाले तथा हमारी रक्षा करनेवाले आप ही सारे दुखों से हमें बचानेवाले हमारे महा प्रभु हैं।

 

 सागर, लहर, हवा और

 गहराई सा हम भी

 माया, तेरी महिमा व तू भी,

 मुझ में ही समा जाए ।

 इधर सागर और मानव की तुलना की गयी है।  सागर की लहर, हवा और गहराई के समान हैं, हम सब।  लहर जैसे आप की माया, हवा जैसी आप की महिमासागर की गहराई जैसे हैं आप। हमें यह सत्य समझने का विवेक भी आप प्रदान करें। अर्थात् अद्वैत संकल्प में हम दृढ बनें।

 

सृजन है तू, सृजनहार भी,

सृष्टि का सर्वस्व भी तू

हे देव! स्वयं तू ही है

सृष्टि की सामग्री भी।

  सृष्टि और स्रष्टा दोनों आप ही हैं। इस सृष्टि की हर एक वस्तु तथा सृष्टि केलिए इस्तेमाल सामग्री भी आप हैं।  अर्थात् सृष्टि, स्थिति और प्रलय के पीछे आप ही है।

 

 माया तू, मायाकार भी

 मायारंजक भी तू है

 माया हटाके बना तू,

 मुक्ति दाता आर्य भी ।

 संसार की सृष्टि के कारणभूत बनी दिव्य माया शक्ति आप ही है। आप ही है सृष्टि-स्थिति-प्रलय का इन्द्रजाल रचकर आनन्द लूटनेवाले महा जादूगर। अंत में हमें सांसारिक मायामोह से मुक्त कर सायूज्य प्रदान करनेवाले भी आप हैं।

 

तू सत्य-ज्ञान-आनन्द

तू वर्तमान-भूत-भविष्य,

भिन्न नहीं, तू ही है-

वाणी की चेतन ध्वनि।

 आप सत्य है, ज्ञान है और आनन्द भी है।  यह वर्तमान, भूत तथा भविष्य रूपी समय भी आप हैं।  विचार कर देखें तो सारे लौकिक अनुभवों के आधारभूत खडी दिव्य प्रणव (ॐ कार) ध्वनि आप ही है।

 

 भीतर भी बाहर भी भरे

 तेरे महिमामय पद की

 स्तुति करते, सदा हम।

 हे भगवान! तेरी जय हो।

 आप हमारे भीतर और बाहर दिव्य रूप में भरे हैं। आप के महत्वपूर्ण नाम की स्तुति हम सदा करते हैं।  हे ईश्वर! आप के जयकार से यह विश्व मुखरित हो उठे।

 

जय हो महादेव!

दीन-रक्षा-परायण!

जय हो सच्चिदानन्द!

हे करुणासागर! जय हो।

 हे देवों के देव महादेव! आप की जय हो।  आप इस पृथ्वी के दीनों की रक्षा करनेवाले यानि सच्चे दीनबन्धु हैं।  आप शुद्ध बोध और आनन्द के स्वरूप हैं। आप की विजय सदा हो।

 

 तेरे अथाह ज्योतिर्मय-

 दिव्य सागर की गहराई में

 निमग्न हों हम, बसें वहाँ,

 बसें सदा, बसें सुख।

 अंतिम समय जब हम गहराई से युक्त तेरे ज्योति रूपी सागर में डूबें तब हमें आप की अगाधता की पहचान मिले ताकि हम वहीं बस जाए।  केवल परमानन्द ही बाकी रह जाए।

 गुरुदेव ने "दैवदशकम्"  की रचना अपने 60 वें साल के आस-पास की थी। उस समय तक नवजागरणकार आध्यात्मिक आचार्य के रूप में उनकी ख्याति देश भर में फैल चुकी थी।  उस समय समाज के पिछडे वर्ग के लोगों को सवर्ण लोग मन्दिर तो क्या मन्दिर तक जानेवाले रास्ते में भी प्रवेश करने नहीं देते थे।  श्रीनारायण गुरु ने कई मन्दिरों की स्थापना की। इन सभी मन्दिरों में किसी ऊँच-नीच या भेद-भाव के बिना सभी को प्रवेश मिलता था। मन्दिर की स्थापना इसलिए की थी कि वहाँ लोगों को स्नान आदि करके बाहरी शुचित्व तथा आन्तरिक शुचित्व का पालन करना था। वे मानते थे कि समाज केलिए मन्दिर से ज्यादा लाभकारी चीज़ पाठशालाएँ हैं। श्रीनारायण गुरु ने इस समय आलुवा में अद्वैताश्रम नामक एक संस्कृत पाठशाला खोल दी थी।  वहाँ सभी धर्म तथा जाति के बच्चों  की भर्ती होती थी। उन सब बच्चों को एक साथ हाथ जोडकर भगवान से प्रार्थना करने केलिए श्रीनारायण गुरु ने प्रार्थना गीत के रूप में "दैवदशकम्" की रचना की।  इसकी भाषा बहुत ललित है पर अर्थ और भाव की दृष्टि प्रौढ और गंभीर है। इस विशेषता के कारण बच्चों से लेकर पंडितों तक सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार इस कृति का आस्वादन कर सकते हैं।  शिवगिरि मठ की डायरी से इसकी भी सूचना मिलती है कि 12 मार्च सन् 1925 में महात्मा गाँधीजी भाषण देने केलिए जब मठ में आये थे तब उनके स्वागत केलिए वहाँ के छात्रों ने "दैवदशकम्" का आलापन किया था।

 मनुष्य निर्मित वर्ण-व्यवस्था की निरर्थकता को स्थापित करने केलिए तथा अज्ञता और अंधविश्वास में डूबी जनता को ऊपर उठाने केलिए श्रीनारायण गुरुदेव ने आजीवन कोशिश की।  एक बार अपने शिष्य गण से उन्होंने कहा ""जाति जैसी कुछ नहीं है।  जो कुछ नहीं है, उसे बनाने केलिए मनुष्य क्यों कष्ट उठाये? अभी उसे ठहराने की कोशिश हो रही है लेकिन वास्तव में जो नहीं है उसे अस्तित्वहीन समझकर मिटाने की कोशिश करे तो वह कितना अच्छा कार्य था!"" मनुष्य केलिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर माननेवाले गुरु के प्रस्तुत कथन का सच्चा प्रमाण है- उनके द्वारा विरचित "दैवदशकम्" नामक प्रार्थनागीत।

  22 नवंबर सन् 1922  को कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिवगिरि मठ में श्रीनारायण गुरु से हुई भेंट के बाद इस प्रकार कहा था कि ""इस दुनिया की कई जगहों में मैंने यात्रा की है।  इस यात्रा के बीच कई अवधूतों तथा पुण्यात्माओं से मिलने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ।  लेकिन यह बात खुले मन से मानना पडेगा कि मलयालियों के स्वामी श्रीनारायण गुरु से आध्यात्मिकता में उन्नत और एक व्यक्तित्व मैं कहीं नहीं देख पाया। इतना ही नहीं इनका समकक्ष भी किसी और को नहीं देख पाया।  ईश्वरीय महिमा से स्वयं प्रकाशित तेजस्वी चेहरा और विदूर क्षितिज के किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित योग निमग्न नयन आदि मैं कभी भी भूल नहीं सकता।""

   अब कई कर्मयोगी एक साथ मिलकर श्रीनारायण गुरु के महान आदर्श जो आज के संसार केलिए अत्यंत उपयुक्त है उसे विश्वजन मानस तक पहुँचाने में कर्मरत हैं। "दैवदशकम्" अव्वल दर्जे का प्रार्थनागीत है, सच में इसे बहुत पहले ही विश्वप्रार्थना के रूप में मान्यता मिलना था।  इस उद्देश्य से उन्होंने  राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और यू.एन. तक को निवेदन सौंप दिये हैं।  वर्ण, धर्म, भाषा, देश जैसी बातें कहकर मानव-मानव में भिन्नता ढूँढकर भडकानेवालों से इस संसार के जनसाधारण को बचाकर उन्हें अपना अस्तित्व बोध दिलाने केलिए "दैवदशकम्" सर्वथा उपयुक्त है। जितने ही प्रतिबन्धों का सामना करने पडे तो भी इस सत्य का साक्षात्कर अवश्य होगा कि विश्वगुरु श्री नारायण गुरु द्वारा विरचित "दैवदशकम्" एक उत्कृष्ट वैश्विक प्रार्थनागीत है।

 

संदर्भ सूची

 

1. https://www.youtube.com/watch?v=8Wq_4K2y-W0(or search 'daivadasakam in hindi' on youtube)

2. http://ml.wikipedia.org/wiki/ Daivadasakam

3. Sreenarayana Gurudevan Kuttikalkkayulla Laghu Jeevacharithram - Prof M.K. Sanoo - May 2012

4. Sree Narayana Guru Ariyendathellam - Mangad Balachandran - Dec 2011

5. Viswamaha Gurudevan - Peroor S Prabhakaran July 2009

6. Sreenarayanaguru Navothanathintey Pravachakan - P Parameswaran - August 2008

7. Guru - M.Chandrababu - March 2007

8. Sreenarayana gurudevakrithikal sampoorna vyakhyanam-1 by Prof G Balarkrishnan Nair - 2003

9. Narayanaguru Daivadasakam - vyakhyanam - Nithya Chaithanya Yathi - 1964

10. Sreenarayana Gurudevakrithikal -  Sivagiri Madam Publications - Dec 1951

 

Dr. Mahesh.S  M.A. MPhil Ph.D

(PG Diploma in Functional Hindi-

Journalism and Translation)

Assistant Professor, Dept. of Hindi

S.N. College, Kollam

Ph: 9349079301

 

 

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