डॉ.बाबू.जे : मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा 2010 में हिन्दीतर भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार से सम्मानित । तिरुवनन्तपुरम जिले में जन्म । तीस सालों तक केरल के सरकारी कॉलिजों में हिन्दी का अध्यापन। 2008 में यूनिवेर्सिटी कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से सेवानिवृत्त। संप्रति, केरल विश्वविद्यालय के अनुवाद शिक्षण संस्थान में अतिथि अध्यापक।
प्रकाशित कृतियाँ : ' मुक्तिधारा ' , 'अभिव्यक्तियाँ' , ' उलाहना(काव्य संकलन) तथा – ' आज और आज के बाद ','तहवील ' , 'बरसात में आग' और ' कसाकसी '(कहानी संकलन) ।
डॉ. बाबू की एक कविता और एक लघु कथा यहाँ प्रकाशित की जा रही है ।
अनसुनी माँग
चोट तूने दी मेरे दिल को
उसका इलाज अब तू ही कर,
नासूर बनती हर दिन चोट
यह, मरहम लगा भी न जाता।
टीस से कराह उठता मेरा दिल
थामने कोई दूसरी रहती नहीं
दर्द की जलती आग को तू ही
बुझाने आती, आस महज़
अब यह मुझे जिलाती रखती।
ओठों की मुस्कान तेरी यदि
पट्टियाँ बन बाँधती अभी तो
चोट यह भर जायेगी जल्द ही।
हर पल चीख उठता दर्द से
आहत दिल मेरा कि मुर्गों की
पहली बाँग से जैसे खिलते
दुनिया में फूल अनेक वैसे
ही दर्दों के आ पड़ने से ही
प्यार का बन्धन दृढ़ बनता,
पर कान तेरे बन्द ही रहते।
लघुकथा
क्रान्ति
-डॉ. बाबू.जे
शिष्य : इन सबके होने पर भी यहाँ क्रान्ति क्यों आती नहीं ? गुरु महाराज, कृपा करके बताइए ?
(सहसा आँखें खोलनेवाले गुरुजी के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान)
गुरु : क्रान्ति ! यहाँ भारत में !
शिष्य : हाँ जी, बताइए ।
गुरु : तुझे कहानी सुनने की आदत रहती ?
शिष्य : हाँ हाँ, ज़रूर।
गुरु : तो ध्यान से सुन ले। एक आदमी के पैरों तले दबकर एक चींटी मर गयी। अन्य सारी चींटियों ने मिलकर इस अन्याय के खिलाफ एक सभा का आयोजन किया। सभान्त में नेता चींटियों ने फैसला सुनाया कि इस घोर अन्याय के बदले में उस आदमी को काट-काट कर उसकी आँखें फोड दें। फैसले का पूरा समर्थन हुआ। तत्क्षण एक क्रान्तिकारी चींटी उस आदमी की आँखें फोडने निकली। लेकिन कई दिन बीतने पर भी वह चींटी लौट आयी नहीं । अब दूसरी चींटी बदला लेने निकली। वह भी न लौट आयी तो तीसरी निकल पड़ी । इस प्रकार कई चींटियों के जाने पर भी उस आदमी की एक आँख भी नहीं फूट पायी। लेकिन एक चींटी भी वापस नहीं आयी थी। अंत में किसी न किसी रूप में चींटियों को पता चला कि वह आदमी मधुमेही था।
शिष्य : (हँसते हुए) गुरुजी ! शतकोटि प्रणाम ! अब समझ गया ।

केरलाञ्चल
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